Tuesday, December 22, 2015

मैंने अपने आप को विश्वामित्र क्यों कहा?


मैं तो विश्वामित्र हूँ; नहीं विश्वास हो तो मेरे मित्रो से पूछ लो। 

जब मैं बी. टेक. में था। होस्टल में मेरे सहपाठी अलग अलग रेस, जाति, आर्थिक स्तर, पिता के व्यवसाय और धर्म के थे। मैं उन सब से बात करता था। कोई भी मेरे रूम में आता तो मैं उसे जरुर बैठाता और बात करता। यह नहीं मायने रखता कि वह पंडित है कि दलित है; यह भी नहीं मायने रखता कि वह अमीर (NRI कोटा का) है या गरीब है; यह भी नहीं मायने रखता था कि वह पंजाबी है या बिहारी है; यह भी नहीं मायने रखता था कि वह हिन्दू है मुस्लिम है; यह भी नहीं मायने रखता था कि उसके पिता गवर्नमेंट सर्विस में प्रथम श्रेणी के अधिकारी हैं या क्लर्क हैं। मैं हॉस्टल में किसी को भी बड़ा या छोटा नहीं समझता था। 

जब मैं जॉब करता था। कैनन इंडिया में रॉय जोसफ और महेंद्र कुमार के साथ लंच करता था। कभी मिस्टर बिमलेंदु वर्मा, प्रशांत शर्मा वगैरा के साथ भी लंच किया हूँ। इनमे कोई ईसाई था; तो कोई हिन्दू था। हिन्दू में कोई कायस्थ था; तो कोई शायद दलित था। मैं सबसे बोलता भी था। 

मेरी पहली कुक शिखा दलित थी। वह अपने मन से कुछ भी बनाती। तो मैं उसे चाव से खाता। मेरी दूसरी कुक ससुराल साइड से चंद्रा और मैके साइड से साहा जाति की थी। वह अपने मन से कुछ भी बनाती। तो मैं उसे चाव से खाता। 

मेरे घर मेरे आटे चक्की के मशीन के स्टाफ सुदामा चाचा चमार थे। वे मेरे पिता के उम्र से थोड़े कम उम्र के थे। इसलिए मैं उन्हें चाचा कहता था। वो मेरे घर प्रतिदिन दोपहर में खाना खाते। मेरे घर पूजा के लिए पंडित जी भी आते। वे लोग भी मेरे घर खाना खाते। हाँ, यह अलग बात है कि मेरे घर पूजा के लिए अलग बर्तन होते; जिसमे पंडित जी लोग खाना खाते। मेरे घर मेहमान के लिए अलग बर्तन होते। मेरे घर स्टाफ को खाने के लिए अलग बर्तन होते। मेरे घर चुपके से (बिना मेरे दादा को बताये) छत पर मांस बनता। तो उसके लिए अलग बर्तन होते; और वे बर्तन और चूल्हा छत के किसी कोने में होते; उन बर्तनों को रसोई घर में कभी नहीं लाया जाता। प्रत्येक दीपावली के मौके पर मेरे दोनों घरों की पुताई होती। वह पुताई एक मुस्लिम से होती थी। जो कि मेरे चाचा लोगो के उम्र के थे। और मैं उन्हें चाचा बोलता था। 

हम लोग बनिया हैं। मेरे दादा जी के दुकान पर प्रत्येक दिन मेरे दादा जी से मिलने मेरे पिता के आटे चक्की के मशीन के स्टाफ (यानि सुदामा चाचा; जो कि चमार थे) के पिता और मेरे पिता के गुरु महाराज कैलाश पंडित जी आते।

यानि कि व्यक्तिगत लेवल पर मेरी और मेरे परिवार की सबसे मित्रता थी। लेकिन अपराध को कण्ट्रोल करने के लिए मेरे सेमिनार के सारे समीकरण ग्रुप पर आधारिक हैं। फिर भी किसी को भी सामाजिक ग्रुप को समस्या नहीं होती। सब खुश हो जाते। 

रूम में जब मैं सेमिनार की तैयारी करता था; तो लंका और कुरुक्षेत्र युद्ध के घटना के कथा के दौरान मैं बक बक कर यह भी कहा कि मैं क्यों किसी पंजाबी और बंगाली की झूठमुठ के अपनी कथा सुनाकर शिकायक करूँगा? क्यों कि मेरे तो कोई पंजाबी और बंगाली दुश्मन नहीं है। मेरे बहुत सारे पंजाबी और बंगाली मित्र हैं। कोई भी पंजाबी या बंगाली ने मेरा नहीं बिगाड़ा है। अगर फिर भी तुम लोगो को लगता हो कि मैं दुश्मनी निकाल रहा हूँ; तो मेरा कोई पंजाबी और बंगाली दुश्मन लाओ। 

हाँ, मैं अपने बैताल राज के प्रोफाइल से एक दलित से खूब झगड़ा और एक मुस्लिम के बात को सपोर्ट किया। क्यों कि दलित लड़के की विचार सामाजिक नियमो को तोड़ रहे थे। इसका मतलब यह नहीं कि मैं दलित को छोटा समझता हूँ।

सबसे मजेदार चीज यह है कि इस गांडी डायनेस्टी के द्वारा अफवाह फैलाये जाने पर बिना किसी कारण के तुम सवा बिल्लिओन्स मेरे दुश्मन बन बैठे हो; और तुम सब मेरे मौत की साजिस रचे हो। 

(जारी)

इस पोस्ट से जुड़े पोस्ट:
१. 

अंग्रेजी संस्करण:
Why did I call myself Vishvamitra?

अंत में, मैं सबसे महत्वपूर्ण बात यह कहूँगा कि पशु पक्षियों को मत खाओ; और उन्हें मत तंग करो। अगर गाय भैस वगैरा को पालो तो उन्हें मान दो; और उनके गले में मत रस्सी बाधो। नहीं तो अपने पतन की रफ़्तार तेज कर लिए। यह मेरे समूह विवाद सिद्धांत के आधार पर है; जो कि मैंने अपने रूम मे जिक्र किया था। 

(hutiaram.blogspot.in)

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