मैक्सवेल परेरा: पब्लिक को हवा देकर भटकाने वाली बात अलग है। आप ठीक तरीके से सोच कर समझ लीजिये। what are you trying to do? आपने लॉ बनाया १६ दिसम्बर के बाद। काफी उत्तेजन हो गया। जो आपने समझ लिया, कंट्री ने समझ लिया, जस्टिस वर्मा कमेटी ने ये जो सुझाव दिया, सबके बाद आप लोगो ने स्त्रिन्जेंट लॉ बना दिया। अभी उसके ऊपर डेथ पेनल्टी का चर्चा कर रहे है। क्या फायदा हुआ आपको? क्या मिला? जब तक तो असलियत, जो असली ह्यूमन करैक्टर, जो सोसाइटी का कमिया आप ख़तम नहीं करना चाहेगे। और उसको ठीक तरीके से सुलझने के लिए आप लोग रास्ता नहीं ढूढेगे। आप का लॉ, और भी जो मर्जी जो करते रहिये। कुछ नहीं सुलझेगा। चुतिया राम: हा. मैक्सवेल परेरा! आप सही हो। लेकिन ये सब जो श्रेष्ठता के भावना से ग्रस्त है। इससे काम नहीं चलेगा। मै बोल रहा हू कि ४०% क्राइम इंडियन लॉ लेके आई है। ३०% क्राइम इंडियन फिल्म इंडस्ट्री लेके आई है। ये सब लिगलियाये और फिल्मियाये होने के कारण बिलकुल ही विश्वास नहीं कर रहे होंगे। मै बोलता हू कि एक सेमिनार के आयोजन करो और इंडिया के टॉप १०० एक्सपर्ट्स को इकठ्ठा करो। मै ये साबित कर दूँगा और समस्या का समाधान भी कर दूँगा। जानता हू कि तुम सब ये कहोगे कि मै ही श्रेष्ठता के भावना से ग्रसित हू। लेकिन मेरे बिना कोई इस पहेली को सुलझा ही नहीं पायेगा।कर भला, हो बुरा
Tuesday, May 7, 2013
Who is to take responsibility for gender crimes: Society, police or the lawmakers?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment