शिक्षा तो महत्व रखता है। सबसे अच्छा उदाहरण मेरे परिवार से दिया जा सकता है। मेरे दादा जी तीन पास थे। जब मै छोटा था, प्रतिदिन सुबह में पहली मंजिल पे पूजा वाले कमरे में पूजा के बाद जब दादा जी को धूपबत्ती दूसरी मंजिल के छज्जे में तुलसी के पौधे को दिखानी होती थी। दादा जी मुझसे कहते, "जाके अपनी माँ से कह दो की वह बरामदे से हट जाये"। मेरा भरुवा बाप दस फेल। जो की मेरे दादा जी से ज्यादे पढ़ा लिखा था। वह मेरे बहनों के भोसड़े के पीछे पड़ा था। लेकिन बेचारा मेरे बहनों का भोसड़ा नहीं पा सका। क्यों की हमारे संस्कृति में बेटियों की शरीर नहीं छुयी जाती (बशर्ते वो बच्ची न हो)। मै बी. टेक. जो की अपने बाप से जयादे पढ़ा लिखा। मै अपनी छिनार माँ के भोसड़े के लिए इतना लालायित हू की मै चाहता हू की कोई मुझे काट के मेरी छिनार माँ के भोसड़े में डाल दे। वैसे, मेरा बाप जिस समय मेरे बहनों के भोसड़े में पीछे पड़ा था उस समय मै कक्षा पाँच में था। काश! उस समय मै ज्यादे पढ़ा होता तो मै अपने बाप का साथ दिया होता। मै अपनी माँ को चोदता और मेरा बाप अपनी बेटियों को चोदता। मेरे घर में पहली मंजिल पर पूजा के लिए एक अलग कमरा है। जिसमें भगवान शिव के त्रिशूल है। उसके जगह देसी कट्टा होता। उस पूजा वाले कमरे में तिजोरी है। जिसमे गहने रखे जाते थे। उन गहनों के जगह कंडोम होता। उस पूजा वाले कमरे में दीवारों पर भगवान जी की तस्वीरे है। उन भगवान जी के तस्वीरों के जगह पोर्न एक्ट्रेस की तस्वीरे होते। उस पूजा वाले कमरे में वेद होते थे। जिसे दादा जी रोजाना पढ़ा करते थे। उन वेदों की जगह पे चुदाई की कहानिया होती। मै भी तो रोजाना हनुमान चालीसा पढ़ा करता था। जिसका फल ये है की आज मुझे भोसड़ा नहीं मिल रहा है। दूसरी मंजिल पर वीचो वीच में आंगन है जिसमे पूजा और हवन हुआ करता था। मै भी दादा जी और पाँच पंडित जी के साथ हवन किया करता और स्वाहा स्वाहा किया करता था। आज मेरे लाइफ की स्वाहा स्वाहा हो गयी है। पूजा और हवन के जगह पे मेरे बहनों को मुजरा होता। आंगन के बगल में बरामदा है। जहाँ पाँचो पंडित जी लोगो की भोग लगा करता। उसके जगह पे मेरे बहनों के दीवाने आते और मेरे बहनों के नाच पर रुपये लुटाते। मेरे दादा जी बनिया (वैश्य) है। मेरे दादा जी गोरे थे। मेरा बाप सावला। मेरे बाप के बारे में दादा जी कहते थे की वह उनका औलाद नहीं है। वह तो चमार (दलित) के औलाद है। यह सुनकर लोग मेरे दादा जी के बारे में कहते थे की ये बुढ़ापे में सनक गए है। जब २००७ मै घर छोड़ा तो मैंने अपने बाप के बारे में बोला कि यह ऐसा आदमी है जिसके बाप ने कहा कि यह उनका औलाद नहीं है। आज मै इसका औलाद यह कहता हू कि यह मेरा बाप नहीं है। दो साल एक कमरे में बंद होने के बाद मुझे अपने गलती का अहसास हुआ। और मैंने अपने स्टेटमेंट में सुधार किया। और अपने बाप के बारे में बोला कि यह सही है कि यह अपने बाप के औलाद नहीं है। यह तो भीमराव अम्बेडकर के औलाद है। लेकिन मै इसी का औलाद हू। और उस समय मेरे शरीर में भड़वा खून दहाड़ मारने लगा।कर भला, हो बुरा
Wednesday, May 1, 2013
Education is key, we have to change fundamental structure : Javed Akhtar
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment